श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित कर्मयोग

Authors

  • डॉ. अर्चना त्रिपाठी Author Author

Abstract

 

भारतीय साहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता की जैसी प्रतिष्ठा है, वैसी किसी अन्य ग्रंथ की नहीं हो सकती। यह भारतीय चिंतन प्रक्रियाएं, भारतीय जीवनदर्शन, एवं भारतीय संस्कृति के आधारभूत मूल्यों को जितनी स्पष्टता से प्रस्तुत करती है, वैसी स्पष्टता अन्यत्र प्रायः उपलब्ध नहीं होती। वास्तव में, इसे किसी विशेष युग या काल विशेष की सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। यह अपने स्वरूप में लगभग पूरी तरह से काल निरपेक्ष है। इसका संबंध मानव जीवन में अनिवार्यतः उपस्थित होने वाले जीवन संघर्ष और करणीय-अकरणीय की समस्या से है। अतः यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है, चाहे वह किसी भी देश, काल, या जाति का हो।  

यदि गहराई से देखा जाए तो इसका कारण गीता के उपदेशों का वह तत्व है, जो आज तक सभी देशों और कालों में प्रासंगिक बना हुआ है, क्योंकि इसमें मानव जीवन को हर दृष्टि से संवारने वाली व्यावहारिक शिक्षा देने वाला तत्त्व निहित है। इस चिंतन की विशेषता यह है कि इसमें कोई नया मार्ग या पंथ नहीं लाया गया, बल्कि जिस समय गीता लिखी गई, उस समय तक इस देश में चल रही विभिन्न दर्शन शाखाओं का सार लेकर उनका मानव जीवन के लिए उपयोगी ऐसा संन्यास कर दिया गया कि तब से लेकर आज तक इस देश को किसी नए दर्शन की आवश्यकता नहीं पड़ी।  

यदि यह पूछा जाए कि इस गीता की सबसे अधिक उल्लेखनीय बात क्या है या इसकी सबसे बड़ी देन क्या है, तो एक वाक्य में यह निष्कर्ष किया जा सकता है कि वह है गीता का निष्काम कर्मयोग।  

अगर इसमें कुछ और सुधार या बदलाव चाहिए हों, तो बताइए!

Author Biography

  • डॉ. अर्चना त्रिपाठी, Author

    Assistant Professor

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Published

2025-03-13

How to Cite

श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित कर्मयोग. (2025). Sanatanodaya, 1(1), 148-152. https://sanatanodaya.com/index.php/dj/article/view/56